वाह रे किस्मत तेरी खुश्बू जो सदा बसती हैं नाभि में तेरे
धिक्कारते भगाते पनाह न देते प्रेमियों को ये जगवारे हैं
पहचानो जरूरत क्या जहाँ में खोजने की मस्त हो जावो
जब तेरी मस्ती चढ बोलेगी तो दुनियायी हकूमतें डोलेगीं
होता जब जागा तब सोया हुआ माया संसार में भटकता
होता मस्त बेपरवाह संसार से मंजिलें मिलती विचार से
बेबुनियादी लक्ष्य मंजिल का न बना न पाने को खोजा
जिओ मंजिल विहिन मान श्मशान में सिर्फ तू जागता
दफन कब्रों में हुये जो ताउम्र मंजिल को तलाशते रहे हैं
रोते वे दर्दों के व्यापारी, मस्ती व रख जिन्दा कहकहे हैं
प्याला सब्रशांति का पी न देख कौन कितने पानी में हैं
जो बह गया रूके नही कुछ यहाँ बहे वो सामने बहता हैं
देख तमाशा जग का, न ले-दे दर्द, सुन पथिक कहता हैं
पथिक
अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग –
सूनी राह का पथिक
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