हम बन बैठै हैं उनकी मुस्कानों की यादों के प्रहरी
खुशियाँ हमारी छिप गई, मिली पीडा छिपी गहरी
भूलने की कोशिश दर्दों को कर याद,यादों में सोते
कहते लोग पथिक अनजाना हम अलग जो होते हैं
खुली आखों से निहारते पर भटकते हैं यादों म़ें हम
कैसा वह याराना कैसे बनाया हमें उसने दीवाना हैं
दुनिया हस़ीं मुस्कानें हसीं पर नजरें दर्दों पर ठहरी
क्या खूब यारों तुम वहाँ प्रहरी बने हम यहाँ प्रहरी
कहीं देखी घाटियाँ दर्दों से गहरी जो हुआ करती हैं
दिखा मुस्कानें दर्द दे ताउम्र रहे हम यादों के प्रहरी
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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