रविवार, 16 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक – ६५६ -- अनदेखे खुदा की चाहत ----- पथिक अनजाना

सम्हल इंसान तू क्यों किया करता हैं

परवाह अनदेखे खुदा की यार जीवन में
फर्ज अपने कर पूरे दुनिया में फैलावे गर
इंसानियत पर न बन तू कभी भार यार
यही उस अनदेखे खुदा की चाहत मान
सुन यही प्रकृति ने सुपुष्ट विचार कहा
फर्जों की अदायगी में सदैव सजग रह
नैन मूंद काम क्रोध लोभ मोह अहं से
माना जमाना तुझे सम्मान नही देगा
पर सम्मान अपनी आत्मा  से पावेगा
तेरी आत्मा अंश परमात्मा का कहते हैं
नजर आत्मा में सम्मानित हो गया गर
सम्मानित  तथाकथित खुदा का होगा
खौफ लाभप्रद  पर आडम्बरी बनाता हैं
आत्मविश्वास शांति ,सुदृढता दिलाता हैं
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )

ब्लाग सूनी राह का पथिक

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