गुरुवार, 13 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ६५२ --- वे खुद बनावेंगें -- पथिक अनजाना

सुनने को मिली यहाँ मुझे सीख अनमोल हैं
वर्तमान युग में कहलाते जो  सच्चे बोल हैं
यारों  मेहनत की कमाई को इस तरह बांटो
स्वास्थय,खाद्य,वस्त्र आवास क्रमश: क्रम
तब समाज के बाद संतान सुख व शिक्षा हैं
उनकी उच्च शिक्षा व स्थायित्व सोच त्यागो
इंसान तुम रहो इंसा, न बनो कभी व्यापारी
संतान हेतू न पालो, धन जोडने की बीमारी
इनकी हेतू किया गर समर्पण देखे न दर्पण
विश्वास न करो किसी पर, स्वप्न सजावेंगें
किस्मत गर उनकी तो राह वे खुद बनावेंगें

पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )

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