मंगलवार, 11 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक - ६५० -- तेरी प्रकृति की खातिर ---- पथिक अनजाना

वर्ग विशेष ने अपनी भावी पुश्तों के
पालनार्थ खौफ खुदा का बनाया यहाँ
मेहनतकश इंसा ने खरबों का धन को
खुदाई ताजमहल बनाने में लगा देते हैं
काश खरबों के धन को इंसानियत की
खुश्बू फैलाने में निस्वार्थ लगाया जावे
हैवानियत को जगह न मिलती कहीं.हें
न इंसा हैवानियत का गुलाम हो कभी
न इन राजनेताऔ धर्मनेताऔ की कभी
शरण जाना किसी पीढी को होता  यहाँ
न होता खुदा का नाम न जात धर्म कोई
न इनका प्रचार प्रसार यहाँ होता कभी भी
यार जग में अब राज व धर्म नेताऔ.की
पूजा शैतान पूजा कहला बदनाम हो.रही.हैं
रे इंसान क्या तेरी प्रकृति की खातिर यहाँ
नियंत्रित करने हेतूखौफ खुदा का जरूरी हैं
खुदा शैतान दोनो तेरे भीतर सदा से बैठै हैं
हंसता पथिक सुन कथा बाहर के लुटेरों से
लुटता लूटता,षडयंत्रकारी क्यों तू बनता हैं
फंस खौफ में सजाता जो दुकानें लुटेरों की
कर प्रयास शैतान विहिन हो जा हमसफर
राह देखे परिवर्तन की दफना शैतानी जहर
मैं अपने विचार व्यक्त करता यहाँ पर हू
हो सकता नजर खुदा आता हो आपको ही
नही ऐसे बिना जाने,  अनुसरण कर जायें
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग सूनी राह का पथिक (https://www.blogger.com/home)
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें



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