सजा खुदा बख्शता हमको विगत कर्मों के लिये
पर सजाते जिन्दगी रहे अपने मरहमों के लिये
रजा चले खुदा की ताउम्र के हर लम्हे के लिये
जिन्दगी सजाते पर दाग उभरते सजा
आते-आते
गरूर इतना खुद पर गुथ्थियाँ सुलझाते रह जाते
बितती उम्र हम न समझते इशारे क्या कहते हैं
किनारों व बहती नदी साथ हो, साथ न बहते हैं
हम नही साथ तो लोग पथिकअनजाना कहते हैं
पथिक
अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग –
सूनी राह का पथिक
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित
करें
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें