होकर
शांत गुजारो हर पल पल अबयहाँ
जिन्दगी में न किसी के करीब आओ
रात की नीरवता से तुम टकरावो नहीं
कभी किसी से बदला लेने हेतू
नविचारो
उस हर पल को हंस जियो जो अब तो
बीत रहा हैं न रौंदौं आत्मा को कभी
तुम
न तडफाऔं भ्रमित आशादीप को जलाओ
निराशा को ठिकाना नअपना कभी बतावो
सूर्य किरणें खोजते आवेगी अपने
कर्मोंहेतू
खुद न्यायाधीश न बनो आ संसार में
कभी
खुद के साथ न्याय कर नही पाते हो
तुम
मोह, बंधन, लोभ भय में रहते सदा
गुम
न याद गली न पता जाना हैं तुम्हें
कहाँ
दर्द होता गुलाम समझते सबको हम जो
भलाई हैं सब राहे सफर के किनारे
समझो
ब्लाग – सूनी राह का पथिक
पथिक अनजाना
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