सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६२८ -- सब ही तेरा हो जायेगा --- पथिक अनजाना

नजर जिधर डाले इंसा वह स्वाहा हो रहा हैं
स्वार्थ मानवता की प्रतीक साक्ष्य कहलायेगा
गढी कहानियाँ व लिखी पोथियाँ तो इंसा ने
पूज्य रब को भी न कहीं कभी भी बख्शा हैं
दर्शाया रब भी स्वार्थी हैं कि जी हजूरी करो
तो खुदाई न्यामतैं इंसानों पर बरस जाती हैं
कैसे कहें हम खुदा का बनाया इंसा महान हैं
हद हो गई खुद को खुदा के साथ खडा कर
अपने स्वार्थी स्वभाव को खुद बेनकाब किया
मान खुदा पूजे सामने जो मौजूद योनि में हैं
नही अर्थ बैठा किसी इंसान को सिंहासन पर
किसी गरीब परेशां को दुत्कार दो तुम इंसान
माना नही राहें, सुझाव,निर्देश सजे ग्रन्थों में
रख काष्ठ या आले में भयाक्रान्त पूजते रहे
बाहर लगे मोहक भीतर इंसा के गुम रौनकहैं
यारों बाह्य चकाचौंध में खोया इंसान रोया हैं
भीतरी गंदी गर्म हवा निकले ,सुगन्ध पायेगा
बाहय न सजाये न पूजे न पुजाये गर इंसान
ढोंगी न जाना जावेगा सब ही तेरा हो जावेगा
ब्लाग  --   सूनी राह का पथिक

पथिक अनजाना

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