जमाने
में कुछ घाव भी देते हें यार कुछ लगाते पैबंद
हैं
लगाया जहाँ पैबंद आ आ कर करते
इशारा घाव कैसा है
कुछ करीब आ अफसोस जताते कुछ बहाने
चाय पीते हैं
मानों दुनिया सिमटी घावों पर एहसास
घाव का दिलाते हैं
दस्तूर जमाने का दस्तूर यही खुदाई
खौफ को दिखाने का
घाव लिखें होभाग्य में स्प्रिट
लगाने का बहाना जो चाहिये
कौन सुने दर्दिली चीखें आहत को
बेनकाब हो जाना चाहिये
बुराई गैरों की सुनने को कब्र में
जाने से रूक जाना चाहिये
दर्द कम बाँटता जमाना पैबंद दिखानेको
यार भी रजामंद हैं
-------------------यार लगाते कुछ
पैबंद हैं
ब्लाग -- सूनी राह का पथिक
पथिक अनजाना
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