अनुभव
बताते हकीकत में लुत्फ नही हैं अपनों व परायों में
लगता मुझे यहाँ हर शख्स नाखुश हैं
दिल ही दिल में हमसे
वजह मेरे अनोखी राह पर फैलते चलते
कदमों व सायों से हैं
हैरां हू परेशां हू कि आखिर इन
अपने परायों को हुआ क्या हैं
आज तक न जान सका मैं कि उनकी आखिर मंशा क्या हैं
अन्ततः निर्णय किया जो उनके भाग्य
में लिखा वह घटने दें
हम निहारें प्रकृति ,सामाजिक उथुल
पुथल के बादल छटने दें
अपरिवर्तित इंसानी स्वभाव न मेरे
उदगारों से बदल पायेगा
ज्यों गुजरे अनेकों जमी से पथिक भी
खाक में मिल जायेगा
गर कभी गौर किया किसी ने तो वह
राहखोजता रह जायेगा
ब्लाग --
सूनी राह का पथिक
पथिक अनजाना
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