शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६१८ -- संविधान की धज्जियाँ उडाता हैं -- पथिक अनजाना

मानवता के ज्ञात इतिहास पर जबजब भी
गौर निष्पक्षता से हमारे व्दारा किया गया
आदिकाल से वर्तमान के अभी समय तक
हमने जांचा एक समानता सदैव से पाई हैं
ये समानता कि यह मानव आदिकाल से ही
धूर्त,चालाक व पाखंडी मुझे ये नजर आया
गर ईश्वर भक्ति की तो स्वार्थ से इंसा ने
समाज, समूह नेतृत्व में स्वार्थ रखा समक्ष
परिवारिक आशायें ले साथ अपने ख्यालों में
सांसों में फैसलों को पिरोने का प्रयास किया
बाद मरने के कब्र मे शांति से रहा न गया
कयामत के इंतजार में बरसाते रहे कयामत
ताउम्र रहे शामत मरकर जीवित रखी शामत
खुदा परेशान संविधान की धज्जियाँ उडाता हैं
मूल्य कब्रों घाटों का भी लगता रखूं कहाँ इंसा
सदैव चुनौती मुझे दे मासूम बन लाभ लेता हैं
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक

पथिक अनजाना

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