गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक - ६१७ --- कही धूप तनती --- पथिक अनजाना

क्या लहर पापी हैं सजा के वो काबिल हैं
क्यों  जाकर जड  साहिल से टकराती हैं
क्या बून्दें पापी हैं वो सजा के काबिल हैं
वह क्यों रोगी पर जाकर बरस  जाती हैं
क्या इंसान पापी हैं वो सजा के काबिल हैं
परिस्थितियाँ क्यों  गलत कार्य  कराती हैं
खुद लहर,बूंद नही इंसा क्यों सजा काबिल
गर पूर्व कर्मों की वजह से संयोग बनते हैं
सजा मिली बहुक्म खुदा के दूजी सजा क्यों
जो दुनियायी कानून से, दिल से मिलती हैं
वजा सजाओं की एक लोभ में न दिल फेंक
चुनाव तेरा राह का होता निर्णय निगाह का
हर सांस-आस परीक्षा तय करे खुद सजाको
नही कोई पूर्व लेखा तो कहानी कैसे बनती
कही हो बरसात सुखों की कही धूप तनती

ब्लाग  --  सूनी राह का पथिक
पथिक   अनजाना



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