बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ६१६ -- निजी स्वार्थ को हक व फर्ज को भार - पथिकअनजाना

दुनिया में छाई नये जमाने की नयी सोच से मन विचलित होता हैं
नर ताउम्र बिताता मादा हेतू समस्त सुखाय साधन जुटाता रहता हैं 
बच्चे दिन में बुजर्ग संभाले रात्रि में नर के हवाले जमाना कहता हैं
मादा नर को बोतल का जिन्न मान इच्छा-चिराग घिसती रहती हैं
दिनभर नर बतियाता रात्रि मादा की बतियाने की बारी आजाती हैं
विवेक- बुद्धि दोनों खो चुके कैसे उन्नत की सीढियाँ नापते रहते हैं
मादा निजी स्वार्थ को हक व फर्ज को भार माने  स्थिति आनी हैं
कुछ हाजरिनों के मुख से सुनी यह नयी सोच की व्यथा कहानी हैं
खुदा किस जमाने मे हम मौजूद  दिल नहीं यहाँ कुछ कर पाता है
नयी सोच का अतीत वर्तमान भविष्य त्रिवेणी स्नान हमें हंसाता हैं
दुनिया में छाई नये वक्तिया सोच से क्यों मन उद्देलित हो जाता हैं
खुदा ये काल्पनिक कहानी हो गर हकीकत तो सामाजिक परेशानी हैं
-------------------------  मन विचलित होता हैं
कल्पना हैं या कहीं कही इसका एहसास हो रहा हैं आप भी समाज
के अंग हैं  ध्यान दें  क्या हमारे समाज में कदम सुनाई दे रहे हैं?
ब्लाग ---  सूनी राह का पथिक
पथिक  अनजाना



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