मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक - ६१५ --- चलिये मकसद अपनी जिन्दगी — पथिकअनजाना

चलिये मकसद अपनी जिन्दगी का हम पहले संवार तो लें
किया विचार तो जाना खुशी व सही राह चाहता हू मैं अपनी
कर सेवा सतनाम मजलूमों व लाचारों की तू शेष जीवन में
तभी जमीन पर पावेगा लुत्फ जिन्दगी का हकीकत में यहाँ
यही बंदगी जिसकी चर्चा निश्चित होगी दरबारे खुदा में वहाँ
वक्त बहुत कम बचा जिन्दगी में न चूक अब समय नही है
ब्लाग --   सूनी राह का पथिक
पथिक अनजाना


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