बन्धु निवासी हो तुम यहाँ पर
अनजानों के बीच में
यहाँ आसपास जो भी तुम्हारे
वे यहीं मिले हैं सब
तुम्हारी बुद्धिचातुर्य का
क्या अर्थ व क्या प्रयोजन हैं
नही कुछ भी रहा यत्र तत्र
सर्वत्र यहाँ हाथ तुम्हारे हैं
फिर क्यों चिन्तित होते तुम
भावी होनी अनहोनी से
क्यों बाधक आराधक साधक बनते
हो कहीं भी तुम
जग में पथप्रदर्शक नही
पथगामी बन आगे बढते रहो
चलता देख तुम्हें हमसफर
खुदबखुद राह पर आयेंगें
पीछे मुड न देखना राह से भटक
अंह मे खो जावोगे
इंतजार प्रभात का न करो खोये
हो तुम जहाँ में आ
प्रयास तुम्हारे से अनजाने
में शायद राह मिलजावेगी
हो जावो शांत खौफ व चाहतें
अपने दिल से हटा दो
अनजानों का ध्यान छोडो अब
सिर्फ खुद को पहचानो
ब्लाग --- सूनी राह का पथिक
पथिक अनजाना
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