रविवार, 5 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक - ६१३ --- ऐसा ही बेमकसद सा हो ---- पथिकअनजाना

नही चाहिये खुदा मुझे तेरा तोहफा व नियामतें
ताउम्र न जान सका मकसद जमीन पर आने का
सवालों ख्यालों में झूलते न जाना विश्राम कहाँ हैं
जीवन में कसम क्या होती हैं जुबान क्या होती हैं
हालातों में बंधा इंसान इनका सहारा क्यों लेता हैं
इशारे पर परवरदीगार के यहाँ सब कुछ घटता हैं
फंसकर कसम में यह इंसा कुरबान क्यों होता हैं
हंसते अधिकत्तर इंसा गैरों के लिये हंसी खोता हैं
मान नही मिला फिर भी जगहंसाई  पात्र होता हैं
मकसद से भटकता बेमकसद हो जीवन खोता हैं
ब्लाग  ---  सूनी  राह का पथिक
पथिक अनजाना


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