गर जिन्दगी की किताबों में हो खोये तो मानो तुम हो सोये
कैसे शक्तिशाली
शहरों में भी डरे –डरे वनों में डरे रहते हो
वन जीवों से भयभीत
नगर जीवों पर नही यकीन तुम्हारा
रखते दीप जला जाने
क्यों अंधेरे से भयभीत तुम रहते हो
रोशन चंहुओर अपनी
करने को गैरों को बेरोशन करते हो
रोशनी हो या अंधेरा तेरी समस्यायें तो सदा मौजूद रहती हैं
यकी खुद पर यकी कर्मों पर तब तुम विजयश्री को पाते हो
जहाँ यह दोनों पतवारे साथ तो रोशनी अंधेरा बेमानी होते हैं
जागो अंधेरे व रोशनी की हदें तुम्हें स्वंय ही अब मिटानी
हैं
जिन्दगी उसी की कहते जिसने अंधेरे मे भीसांसें पहचानी हैं
ब्लाग --- सूनी राह
का पथिक
सतनाम सिंह साहनी (पथिक अनजाना)
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