छटपटा
रही हैं हर पल इंसानों की जिन्दगी यहाँ पर
लक्ष्मणरेखा
के बाहर खडा रावण इंतजार कर रहा हैं
लक्ष्मणरेखा
के भीतर भी न सकून मिलता इंसा को
हर
अगला क्षण नई अग्निपरीक्षा की बाट जोह रहा हैं
जान
हकीकत लहरों के सहारे छोड कर खुद को हमने
हम
यहाँ लहरे वक्त,जमाने के कहर के बाहर न हुये
शुक्रगुजार
इन बेजुबान ने गा बागों को गुलजार किया
शुक्रिया
खुदाई करिश्मों का गुनहगार को प्यार दिया
ब्लाग
-- सूनी राह का पथिक
सतनाम
सिंह साहनी (पथिकअनजाना)
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