गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६१०-- बस्तियों के बने कानून — पथिकअनजाना

देखिये इंसानी बस्तियों के बने कानूनभी निराले होते हैं
जहाँ चंद बेबस लाचार वहाँ चंद मस्ताने भी हो जाते हैं
ये मस्ताने घरों,दिलों में खुद जाकर आग लगा जाते हैं
सुन बदहाली,बैचैनी यह साथियों साथ दीवाली मनाते हैं
क्यों देते न्यौता कर दुष्कर्म तुम इन मस्तानों को यहाँ
अतीत तुम्हारा मस्तानों की शक्ल में तुम्हें आ सताता
बनाते कानून सिरमौर,विवश हो जाते हैं यहाँ कोई और
तुम भोगते अतीत मस्ताने भविष्य हेतू अतीत बनाते हैं
चक्र चले सुचारू, खुदा यहाँ दर्शक बन मस्त हो जाते हैं
चक्र खेल को देखकर पथिक अनजाना बेबस कहलाते हैं
ब्लाग  ---   सूनी राह का पथिक

सतनाम सिंह साहनी  ( पथिकअनजाना )

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