बेशुमार लम्हों
व सकून को बख्शा ऐसे परवरदीगार ने
न तो लम्हों में
जी सके न लुत्फ संकू का मेंने उठाया
आरामो मान की
जिन्दगी में हम उलझते सुलझते रहे
खुद ही खुद को
लिखने की बेमानी फितरतों में फंसाया
मैं न तो कोई
शायर हूं न जानता शायरी क्या होती हैं
दिल मेंउठे
तूफां को हकीकत बना पन्नों पर लिखते रहे
वक्त कीमत विचारों
की न लगावे न कहे होशियार गये
ब्लाग -- सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह
साहनी (पथिक अनजाना)
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