बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक - ६०९ -- उलझते सुलझते रहे — सतनाम सिंह साहनी

बेशुमार लम्हों व सकून को बख्शा ऐसे परवरदीगार ने
न तो लम्हों में जी सके न लुत्फ संकू का मेंने उठाया
आरामो मान की जिन्दगी में हम उलझते सुलझते रहे
खुद ही खुद को लिखने की बेमानी फितरतों में फंसाया
मैं न तो कोई शायर हूं न जानता शायरी क्या होती  हैं
दिल मेंउठे तूफां को हकीकत बना पन्नों पर लिखते रहे
वक्त कीमत विचारों की न लगावे न कहे होशियार गये
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी (पथिक अनजाना)


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