मंगलवार, 30 सितंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६०८ - रंग न तुम पर दुनियायी रंगों का — पथिक अनजाना



हर क्षण दुनिया के रंग व नजारे मैं बदलते यहाँ देखता हू
रहता हूं मैं भीड में यहाँ दुनिया की फिर भी अकेला हूं मैं
न पति न बेटा न कोई रिश्ता ही इस दुनिया में मेरे यारों
यहाँ की गैरत देख कर हैरत होती क्यों इतना अकेला हूं मैं
मौजूद अनेकों सगे सबंधी, प्रशंसक व ब्लाग के चार यार हैं
अनजान दुनिया के पथिक तुमअनजान दुनिया से आये हो
रंग न दुनियायी रंगों का चढे वर्ना बदसूरत तुम हो जावोगे   
उठती जमीं पर भंवरी चक्रों का फंस यहाँ में कुछ न पावोगे
देखो गर रंग न हुये हावी  तुम पथिक अनजाना कहलावोगे
न फंसो यहाँ तूफानों में जिन्दगी का सूरज डलते देखता हूं 
ब्लाग  --  सूनी राह का पथिक
 सतनाम सिंह साहनी (पथिक अनजाना)

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