बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक – ६३७ -- खुदा न जान पाये पथिक अनजाना

मेरे विचार से इंसानी-संतानों के जन्म के पाँच वर्ष बाद
सर्वप्रथम नव बालक को मानवीय स्वभाव पढाया जावे
अन्य जीव यदा-कदा इंसा हर पल उसे हर दिशा घिरावे
इंसा ऐसा जीव जिसकी हर शक्ल को खुदा न जान पाये
जिसकी जुबां, नैन,दिल-दिमाग भिन्न पर सब साथ चले
आयु के वर्ष व वर्ष के माह-तिथि दिन रात्रि विचार बदले
हर पल मे हो कहाँ न खुद को जाने कब गिरे कब संभले
संक्षिप्त पाठयक्रम न यह विषय सर्वाधिक विशाल गहन
पुरूष से ज्यादा कठिन स्त्री चाल ,बाल्यहठ तो कमाल है
आर्थिक-स्तर.जरूरतें क्षमता दायरा की लक्ष्मण रेखा बेमोल
सृष्टि को विशेषत: इंसान को इंसान से सदैव खतरा रहा हैं
जोर दे पथिक अनजाना  इंसा को इंसा से करना सामना हैं
गर यह ज्ञान जोइंसा जाने तो दुनिया हर ज्ञान नगण्य माने
यहाँ छिपे सारे सुख शांति निर्भिकता निश्चिन्तता पहचाने
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक
पथिक अनजाना
यदि अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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