दर्द मुठ्ठी में बांध हाथ
उठाकरयहाँ चिल्लाता हर
किरदार क्यों यहाँ यह दुनियायी रंगमंच हमारा हैं
समझ न आया मुझे कभी कौन अपना
कौन पराया हैं
समझ नही पाया मैं कौन व कहाँ
कैसी मंजिल होती?
वक्त मुठ्ठी में बाँध न सका कभी
लकीरें जान न सका
मूक इंसान हाथों के इशारों
से मुझे सदासमझाता रहा
मैं अंध--बधिर न जान सका
संसार क्या बता रहा हैं
मैं अनपढ हुआ सिद्ध ग्रन्थों
के सार न जानमान सका
मौजूद सब यहाँ दोष निकालने म़ें
हर पल तो बहायाहैं
ज्ञानी समझे जीवन यहाँ हैं
मैं जानता दर्द समाया हैं
दर्द को दर्द माना जबकि नही
होता कोई कही दर्द हैं
गर मैंने होता दुनिया में
जीवन को दर्द न समझा हैं
तो न पथिक अनजाना कहलाता न
दर्द को सहलाता
रहता बन साक्षी यहाँ, खोजता रहता दर्द रहता कहाँ हैं
दर्द कम्बल पकडे रहता हू और कहता
दर्द छोडता नही
ब्लाग -- सूनी राह के पथिक
पथिक अनजाना
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