सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक --- ६३५ -- सत्य दुनिया में जीना -----पथिक अनजाना

सत्य दुनिया में जीना भी एक कला हैं
हमराही भी यहाँ हमें भ्रमाता रहता हैं
पाकर शिकायत गैर से किसी गैर की
हम गैर पर जा क्यों हावी हो जाते हैं
बातें रोने में आ हम जिसकी शिकायत
हुई उस गैर से जा क्यों लड जाते हैं
हैरां परेशां होते जब शिकायतकर्ता ही
उसकी ओर जाकर खडा हो जाता हैं
खाते शराबी जैसी कसम न बोलेंगें
अब तब भी जाने क्यों सकूं नही हैं
दे चुनौती हमारी मर्दानगी नेतृत्व को
शिकायतकर्ता हमें खुला ललकारता हैं
पथिक  अनजाना
ब्लाग --  सूनी राह के पथिक
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