सोमवार, 28 दिसंबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७६९ -- भविष्य में नाम रोशन हमारी संस्कृति – पथिकअनजाना

पारिवारिक वृद्ध जनों की चर्चा को गर करे हम यहाँ पर
इतिहास दर्शाता निवृति आयु उपरान्त वानप्रस्थ होते
युग में आयक कार्य निवृति के बाद मार्गदर्शक बनते
वर्तमान में यह काल राजनेता सुधारक बनते कुढते हैं
उपेक्षित वृद्ध विलोमता हर जगह व परिवार में पाते है
अपने इस हश्र को देख दोष वारसानों पर मढ जाते हैं
कुल मिलाकर उचित व न्यायिक लगता वानप्रस्थ था
अब वृद्धआश्रम धनियों के या छत्र नेता के कहलाते हैं
नही लाचार,संतानों व्दारा उपेक्षित वृद्धों के हो जाते हैं
पत्नी से विवश बुजुर्गों के आशीर्वाद भी न ले पाते हैं
बुजुर्ग सचेतक परिवार के हैं पर सत्ता न त्याग पाते
कोशिश करे पर अपनी पत्नी से मर्दानगी पर चुनौती
माना आने वाली पीढियों हेतू प्यार उनका संजीवनी हैं
अतएव पीढियों दोनो व्दारा मध्य राह निकालनी होगी
जो भविष्य में नाम रोशन हमारी संस्कृति की करेगी

पथिकअनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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