मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७६७ --- गगन की सुखी उडान –पट्टी कहाँ ? --- पथिक अनजाना

सोचा कभी तुमने कभी क्यों जिन्दगी सवालों में खोते हैं
कितना मजा आता हैं जब जिन्दगी दो तालों में जीते हैं
तालाब इक दुनियायी नाते संबंधों व हमसफरों से पूर्ण हैं
तालाब दूजा जिससे अनेकों अनन्त गगनों में हम होते हैं
तालाब पहले में शरीर प्रमुख प्रभाव प्रमुख हो ही जाता हैं
अप्रमुख मात्र तालाब दूजे में सभी हमें उडना ही होता हैं
अधिकांश सांसें दुखयारी ताल प्रथम की दूजे की सुखदायी
वर्षा होती शांति की उडती आत्मा हो जग धुंआ ही धुंआ
रात्रिशांति में गगन सीमाहीन दिख जमीं पर कुंआ कुंआ
बंधे कर्मों से न समझे गगन की सुखी उडान –पट्टी कहाँ ?
सुकर्मों को थामो धुंआ – कुंआ राह से हटेंगें यह मेरे यार
दुनियायी विष भी अमृत मान पी मस्त जीवन में होवोगे
दोनों तालों में जीवो.सवाली दुनिया बेसवाली हो  जावोगे
सतनाम  सिंह साहनी (पथिक अनजाना )


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