शनिवार, 29 अगस्त 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७५५ - लिखना लहरों पर -- पथिक अनजाना

लिखा किसी ने खूब कभी यहाँ दुनियायी लहरों पर था
वृक्ष शीतल हवा शीतल छांव देते सारी कयानात को
वृक्ष लुभावनें फलों व मोहक खुश्बू से सरोबार करते हैं
वृक्ष उम्मीद नही रखे इंसान से किसी सेवा या पूजा की
मेहरबां बदले में इन सबके इंसान से कुछ नहीं लेते हैं
खुदा से हर पल हम लेने की उम्मीद लगाये रखते हैं
चाही उसने व्यवहार सुकर्मों का फिर हम क्यों नही देते
इसीलिये मैने उक्त महान का लिखना लहरों पर कहा
कर इतना तो सकते कि उसकी हर कृति को प्यार करें
प्यार व दिया वक्त बिना किसी प्रतिफल आशा के हो
यकीनी राह--ए जिन्दगी सुगन्धित फूलों भरी हो जावेगी
कथन महापुरूष का लहरों पर लिखी बात न कहलायेगी
लहरें न रूकेंगी अपनायी अभिव्यक्ति सुखी कर जायेगी

पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें