गुरुवार, 9 जुलाई 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७४९ -- जिधर मस्त हवा तुम्हें ले आई हैं == पथिक अनजाना

बार इक पथिक अनजाना मस्ती में अपनी जा पंहुचा रेगिस्तान में
पता ही न चला वक्त का न छूटते नजारों व दुनियायी विचारों का
चारों तरफ रेत के छोटेबडे ढेर शांत दुनिया के साक्षी बन रह रहेथे
हंस रहे थे सुनी हमारी दुनिया की बातें वे याद कर कर सामने मेरे
कह रहे थे देखो गौर से उस ओर जिधर मस्त हवा तुम्हें ले आई हैं
पृथ्वी एक परतुम्हारी दुनिया व हमारी में मौजूद कितनी बडी खाईहैं
हरवर्ष वृक्षारोपण मनाते, युवा सामूहिक वृक्षों की हत्यारे बन जातेहो
सुकर्मों से हमने अपनी गोद में सुगन्धित फूलों वाला पौधा पाया हैं
सारी वादी का यह प्यारा दुलारा सारी वादी को खुश्बूमयी बनाता हैं
सुना बाग तुम्हारे में अनगिनत खुश्बूदार पौधे जीते खुश्बू फैलाते हैं
पर फिर क्यों दुनिया तुम्हारी भयानक दुर्गन्धित तंगदिल हो जातीहैं
जिससे वह बेचारा फूल पौधा  जन्म ले खुद को अपमानित पाता हैं
न उसकी कही कभी कीमत न यादें तुम्हारी दुनिया में रह जाती हैं
जिया ज्यों पथिक अनजाना त्यों उसकी स्थायी याद न बन पाती हैं
पथिक अनजाना
ब्लाग  -- सूनी राह के पथिक
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