शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७५० -- न आनन्द की बिकवाली हो -- पथिक अनजाना

ए बाजीगर जादुई शीशे में मुझे राह दिखा इकदम
जहाँ न धन दें न लें बेफिक्र हो लिखते रहे हरदम
विज्ञापन दलालों की न साढेसाती न मिटती बाती
गगन भुवन हो सामने नग्न निहांरू विचारू मग्न
साकी को न याद आये हवा केश लटों को झुलायें
नजरों से खुद को बचा गोरी बांहें उठा लटें सहरायें
जाम व दिल न खाली न आनन्द की बिकवाली हो
खो पथिकअनजाना निर्देश अंगुलियों को देते जाये
चाहे कोई पढें न पढें चाहे चौबारे हमारे चढें न चढें
थिरके अंगुलियाँ मस्त हो पथिक बन हम आगे बढें
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें
पथिक अनजाना



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