काष्ठ पर चढकर कोई बैकुंण्ठ को जाते हैं
कोई सिमट काष्ठ में जमींदोज हो जाते हैं
न जानी दुनिया न बैकुण्ठ न कहीं समातेहैं
खोये विचारों नजारों व शब्दों के बाजारों में
नजर जमी पर नजरें गगन व साकी पर हैं
जिसके लबों पर थिरकता हैं सदा नाम मेरा
कहे सबसे पथिक का उसके दिल में है डेरा
कहता में मुझे पथिक अनजाना ही रहने दो
कलम बनी सौतन मुझे नजरों से कहने दो
सांसें चन्द , हमें अपनी नजरों में रहने दो
ब्लाग -- सूनी राह
का पथिक
पथिक
अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी
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