हंसता पथिक अनजाना कैसे वक्त का वह गवाह हुआ
समझने आदि में समर्थ इंसान को मिली कैसी बद्दआ
जिन्दगी के हर कदम पर मिले आगे खाई पीछे कुआं
गुमान इतना भय इतना सलाह न किसी से ले मुआ
पात्र जगहंसाई का न बन जावे, रहता सदा अनछुआ
पूछे हालेदिल बयां करने अविश्वास का निगले धुआं
इशारा बुतों ग्रन्थों का न समझे बस दे उन्हें वह सजा
राह पनाह खुद खोजे निगाहें दुनिया की लेती हैं मजा
ज्ञानी इंसा अज्ञानी हुआ नामुराद गुमान बना वजह
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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