रविवार, 18 जनवरी 2026

अभिव्यक्ति क्रमांक ६८१ -- मृगतृष्णा के संसार में ---- पथिक अनजाना

तुम अपना प्यार अपनों या समूह खास में न बांटो
बांटो प्यार वहाँ तक जहाँ तकप्यार तुम्हारा जा सके
सूर्य  की किरणों  के समक्ष  हम रखे अगर आईना
प्रतिबिम्बित  किरणें  चहुँ ओर एक सी बिखरती हैं
न सोचो जगत वाले तुम्हारे प्यार की इंतजार मैं हैं
प्यार,संवार के मधु विचार मृगतृष्णा के संसार में हैं
प्रतिफल, नाम जीते या बाद न चाहोगे सुख पावोगे
बीज उत्तम बो निश्चिंत हो जावोगे तो छांव पावोगे
मित्र तख्तियों पर गैर नाम पाके न किसी को डांटों
तुम अपना प्यार अपनों -----

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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