जाने क्यों जमाने की सोच सदैव हमसे अलग हैं
हमारे प्रति रवैया जाने क्यों
सदा ही विपरित रहा हैं
अन्य तरीकों से तो कभी भी होती
पूंछ सीधी नही हैं
अक्ल नही मौके की तलाश व चापलूसी
काम की हैं
शायद वे भारी भूल में हैं
जो अतिविश्वास भरे हुये हैं
किसी का परचम लहराते देख
तमाशा उनकी पसंद
बाद में पछताते साथी लोग सिर
धुनते रह जाते हैं
ब्लाग -- सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)
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